Kavita Milkman Sex Story
परिचय: एक साधारण घरेलू जीवन की शुरुआत
कविता एक 28 साल की खूबसूरत गृहिणी थी। उसकी शादी को पांच साल हो चुके थे। उसका पति, राजेश, एक सरकारी नौकरी में था और अक्सर काम के सिलसिले में बाहर जाता रहता था। कविता का घर दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में था, जहां सुबह-सुबह दूधवाले की आवाज से दिन की शुरुआत होती थी।
कविता की जिंदगी साधारण थी – घर संभालना, खाना बनाना, और पति की सेवा करना। लेकिन उसके मन में हमेशा एक खालीपन रहता था। राजेश काम में इतना व्यस्त रहता था कि कविता की शारीरिक जरूरतों पर ध्यान नहीं दे पाता था। कविता की आंखें बड़ी-बड़ी थीं, होंठ गुलाबी, और शरीर सुडौल। वह साड़ी में बहुत आकर्षक लगती थी, लेकिन उसकी यह सुंदरता अक्सर अनदेखी रह जाती थी।
हर सुबह, ठीक 6 बजे, दूधवाला विमल आता था। विमल 25 साल का जवान लड़का था, गठीला शरीर, काला रंग, और मजबूत बाजुएं। वह गांव से शहर आया था और दूध बेचकर अपना गुजारा करता था। विमल का घर पास के गांव में था, लेकिन वह रोजाना साइकिल पर दूध की कैन लेकर मोहल्ले में आता था। कविता हमेशा दरवाजा खोलकर दूध लेती थी। शुरुआत में यह सिर्फ एक रूटीन था, लेकिन धीरे-धीरे विमल की नजरें कविता पर टिकने लगीं। कविता की साड़ी का पल्लू कभी-कभी सरक जाता, और विमल की आंखें उसके ब्लाउज में छिपे उभारों पर ठहर जातीं। कविता को भी विमल की मर्दाना काया अच्छी लगती थी, लेकिन वह कभी कुछ कहती नहीं।
एक दिन, राजेश को अपने दोस्त के यहां जाना पड़ा। वह रात को ही निकल गया और बोला, “कविता, मैं दो-तीन दिन में लौटूंगा। तुम घर संभालना।” कविता ने हामी भरी, लेकिन मन ही मन उदास हो गई। रात को वह अकेले सोई। सुबह की पहली किरण के साथ विमल की साइकिल की घंटी बजी। लेकिन कविता गहरी नींद में थी। वह रात भर जागती रही थी, पति की याद में। विमल ने दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। वह जानता था कि राजेश बाहर गया है, क्योंकि मोहल्ले में खबरें जल्दी फैलती हैं। विमल ने हिम्मत करके दरवाजा धक्का दिया – वह खुला था। कविता रात को ताला लगाना भूल गई थी।
विमल अंदर दाखिल हुआ। घर में सन्नाटा था। वह दूध का बर्तन रखने किचन की तरफ गया, लेकिन उसकी नजर बेडरूम पर पड़ी। दरवाजा आधा खुला था। अंदर कविता सो रही थी। उसकी साड़ी ऊपर सरक गई थी, और उसकी गोरी जांघें नजर आ रही थीं। विमल की सांसें तेज हो गईं। वह कभी इतने करीब से किसी औरत को नहीं देख पाया था। उसका मन डोल गया। वह चुपके से बेडरूम में घुसा। कविता की सांसें नियमित थीं – वह गहरी नींद में थी। विमल ने धीरे से उसके पास बैठा। उसकी आंखें कविता के चेहरे पर टिकीं, फिर नीचे सरकीं। ब्लाउज के बटन खुले थे, और ब्रा से झांकते उसके स्तन विमल को पागल कर रहे थे।
विमल की हिम्मत और पहला स्पर्श
विमल का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह जानता था कि यह गलत है, लेकिन कविता की सुंदरता ने उसे रोकने नहीं दिया। वह धीरे से कविता के पैरों को छुआ। कविता हिली नहीं। विमल की हिम्मत बढ़ी। उसने अपनी उंगलियां कविता की जांघों पर फेरनी शुरू कीं। त्वचा इतनी मुलायम थी कि विमल का शरीर गर्म हो गया। वह ऊपर की तरफ बढ़ा। कविता की साड़ी और पेटीकोट ऊपर उठा दिया। अब कविता की पैंटी नजर आ रही थी। विमल ने धीरे से पैंटी को साइड किया। कविता की योनि साफ और गुलाबी थी। विमल की सांसें रुक गईं। वह अपनी पैंट खोलने लगा। उसका लिंग पहले से ही तनाव में था – बड़ा, मोटा, और काला।
विमल ने कविता के पैर फैलाए और खुद को उसके ऊपर रखा। वह बहुत सावधानी से आगे बढ़ा। उसका लिंग कविता की योनि से टकराया। कविता हल्की सी हिली, लेकिन आंखें नहीं खोलीं। विमल ने धक्का दिया। उसका लिंग अंदर घुस गया। कविता की योनि गीली थी – शायद रात के सपनों से। विमल ने धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए। हर धक्के के साथ उसका आनंद बढ़ता गया। कविता की सांसें तेज हुईं, लेकिन वह अभी भी सो रही थी। विमल ने उसके स्तनों को दबाया। ब्लाउज के ऊपर से ही वह महसूस कर रहा था उनकी नरमी। वह झुककर कविता के होंठों को चूमा। कविता के मुंह से एक हल्की सी कराह निकली – “उम्म…” लेकिन आंखें बंद रहीं।
विमल अब तेज हो गया। उसका लिंग कविता की योनि में अंदर-बाहर हो रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों की टकराहट की आवाज थी। विमल ने कविता की साड़ी पूरी तरह ऊपर कर दी। अब वह उसके पूरे शरीर को देख रहा था। उसके स्तन उछल रहे थे हर धक्के के साथ। विमल ने ब्लाउज के बटन खोले और ब्रा ऊपर की। कविता के निप्पल गुलाबी और सख्त थे। विमल ने एक को मुंह में लिया और चूसने लगा। कविता की कराहें बढ़ गईं – “आह… राजेश…” वह सपने में पति का नाम ले रही थी। विमल को जलन हुई, लेकिन वह नहीं रुका। वह और जोर से धक्के मारने लगा।
करीब 10 मिनट बाद विमल का शरीर अकड़ गया। वह कविता के अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य कविता की योनि में भर गया। विमल ने सांस ली और धीरे से बाहर निकला। कविता अभी भी सो रही थी। विमल ने उसकी साड़ी ठीक की, ब्लाउज बंद किया, और चुपके से बाहर निकल गया। दूध का बर्तन किचन में रखा और दरवाजा बंद करके चला गया। उसका दिल खुशी से उछल रहा था। लेकिन डर भी था – क्या कविता को पता चलेगा?
कविता का जागना और संदेह
कविता की आंखें 7 बजे खुलीं। वह उठी तो महसूस हुआ कि उसका शरीर दर्द कर रहा है। योनि में एक अजीब सी गीलापन था। वह बाथरूम गई और देखा – उसकी पैंटी गीली थी, और योनि से कुछ सफेद तरल निकल रहा था। कविता चौंक गई। “यह क्या? राजेश तो गए हुए हैं।” वह सोचने लगी। रात को उसने एक सपना देखा था – राजेश उसके साथ प्यार कर रहा था। लेकिन यह सपना इतना वास्तविक क्यों लगा? कविता ने नहाया और कपड़े बदले। लेकिन मन में संदेह था। वह किचन गई तो देखा दूध रखा हुआ है। “विमल आया होगा। लेकिन दरवाजा तो बंद था।” वह याद करने लगी – रात को ताला नहीं लगाया था।
दिन भर कविता उलझन में रही। शाम को वह पड़ोसन से बात की। “दीदी, आज सुबह दूधवाला आया था?” पड़ोसन बोली, “हां, विमल आया था। तुम्हारा घर भी गया था।” कविता का दिल धक से रह गया। क्या विमल ने…? नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता। लेकिन उसके मन में एक अजीब सी उत्तेजना भी थी। विमल की याद आई – उसकी मजबूत बाजुएं, उसकी मुस्कान। कविता ने खुद को झिड़का – “छिः, क्या सोच रही हूं।”
रात को राजेश का फोन आया। “कविता, सब ठीक है?” कविता ने हां कहा, लेकिन मन में तूफान था। वह सोने गई, लेकिन नींद नहीं आई। वह विमल के बारे में सोचने लगी। क्या वह वाकई अंदर आया था? क्या उसने मुझे छुआ था? इन विचारों से कविता का शरीर गर्म हो गया। उसने अपनी उंगलियां योनि पर फेरी। वह गीली हो गई। “आह… विमल…” नाम निकल गया उसके मुंह से। वह खुद हैरान हो गई।
अगली सुबह: विमल का दोबारा आना
अगली सुबह फिर 6 बजे विमल आया। इस बार कविता जाग रही थी। उसने दरवाजा खोला। विमल की आंखें मिलीं कविता से। विमल मुस्कुराया – “भाभी, दूध ले लो।” कविता ने बर्तन लिया, लेकिन उसकी आंखें विमल के शरीर पर टिकीं। विमल ने नोटिस किया। “भाभी, आज जल्दी उठ गईं?” कविता बोली, “हां, कल नींद गहरी थी।” विमल का चेहरा लाल हो गया। वह समझ गया कि कविता को शक है। लेकिन वह चुप रहा।
कविता ने दूध लिया और दरवाजा बंद किया। लेकिन मन में उथल-पुथल थी। वह सोच रही थी – अगर विमल ने किया तो क्यों? और मुझे क्यों अच्छा लगा? शाम को वह बाजार गई। वहां विमल मिला। विमल दूध की दुकान पर था। कविता ने बात की – “विमल, कल सुबह तुम अंदर आए थे?” विमल घबरा गया। “नहीं भाभी, मैंने सिर्फ दूध रखा था।” लेकिन उसकी आंखें झूठ बोल रही थीं। कविता मुस्कुराई – “ठीक है।” और चली गई।
रात को कविता ने फैसला किया। राजेश अभी दो दिन और बाहर है। वह देखना चाहती थी कि विमल फिर आएगा या नहीं। वह सोने गई, लेकिन दरवाजा जानबूझकर खुला छोड़ दिया। गहरी नींद का नाटक किया। विमल आया। दरवाजा खुला देखा। वह अंदर गया। फिर बेडरूम में। कविता सो रही थी – या सोने का नाटक कर रही थी। विमल ने फिर वही किया। उसने कविता की साड़ी ऊपर की। इस बार कविता ने हल्का सा विरोध किया, लेकिन आंखें बंद रहीं। विमल समझ गया – भाभी जाग रही है। वह और उत्साहित हो गया।
विमल ने कविता के स्तनों को चूमा। कविता की कराह निकली – “आह… विमल…” विमल रुक गया। कविता की आंखें खुलीं। “तुम…?” विमल डर गया। लेकिन कविता ने उसे पकड़ा – “रुकना मत।” विमल हैरान। कविता बोली, “कल भी तुम थे ना?” विमल ने हां में सिर हिलाया। कविता मुस्कुराई – “फिर करो।” विमल पागल हो गया। उसने कविता को नंगा किया। उसके पूरे शरीर को चूमा। कविता की योनि को जीभ से चाटा। कविता चिल्लाई – “आह… विमल… और…” विमल ने अपना लिंग अंदर डाला। इस बार जोर-जोर से धक्के मारे। कविता उसके नीचे तड़प रही थी। “विमल… तेज… आह…” कमरा उनकी आवाजों से गूंज रहा था।
विमल ने कविता को विभिन्न मुद्राओं में लिया। पहले मिशनरी, फिर डॉगी स्टाइल। कविता की गांड पर थप्पड़ मारे। कविता को दर्द में मजा आ रहा था। “विमल… मुझे चोदो… और जोर से…” विमल ने घंटे भर तक सेक्स किया। आखिर में कविता के मुंह में झड़ गया। कविता ने सब निगल लिया। दोनों थक कर लेट गए। कविता बोली, “यह राजेश को मत बताना।” विमल हंसा – “नहीं भाभी।”
गुप्त संबंध की शुरुआत
इस घटना के बाद कविता और विमल का संबंध गहरा हो गया। हर सुबह विमल दूध देने आता, लेकिन अब दूध के साथ प्यार भी। राजेश जब घर पर होता, तो वे सावधानी बरतते। लेकिन जब राजेश बाहर जाता, तो पूरी रात साथ बिताते। विमल कविता को नए-नए तरीके से संतुष्ट करता। कभी किचन में, कभी बाथरूम में। कविता की जिंदगी में अब रंग आ गया था। वह खुश रहने लगी।
एक दिन राजेश को शक हुआ। “कविता, तुम बदल गई हो।” कविता घबरा गई, लेकिन बोली, “नहीं तो।” लेकिन विमल और कविता का प्यार जारी रहा। यह कहानी एक साधारण गृहिणी की कामुक जागृति की है, जहां दूधवाले ने उसके जीवन में दूध की तरह सफेदी नहीं, बल्कि जुनून की आग भरी।